भीषण गर्मी में जहां साफ-सफाई जीवन की जरूरत बन जाती है, वहीं अमरिया विकासखंड की ग्राम पंचायत धुंधरी में हालात भयावह हो चुके हैं। यहां विकास और स्वच्छता केवल कागजों तक सीमित नजर आ रही है, जबकि जमीनी सच्चाई गंदगी, बदबू और बदइंतजामी की दर्दनाक तस्वीर बयां कर रही है।


भीषण गर्मी में जहां साफ-सफाई जीवन की जरूरत बन जाती है, वहीं अमरिया विकासखंड की ग्राम पंचायत धुंधरी में हालात भयावह हो चुके हैं। यहां विकास और स्वच्छता केवल कागजों तक सीमित नजर आ रही है, जबकि जमीनी सच्चाई गंदगी, बदबू और बदइंतजामी की दर्दनाक तस्वीर बयां कर रही है।

गांव में एक ऐसा रास्ता है जो आधा बना और आधा अधूरा छोड़ दिया गया—और यही अधूरापन आज ग्रामीणों के लिए अभिशाप बन गया है। रास्ते के बचे हिस्से पर गंदगी का अंबार लगा है, जिससे गुजरना किसी चुनौती से कम नहीं। सबसे ज्यादा मार दिव्यांग और बुजुर्ग झेल रहे हैं, जिन्हें मजबूरी में गंदगी के बीच से होकर करीब आधा किलोमीटर लंबा चक्कर लगाना पड़ता है। ग्रामीणों का आरोप है कि सफाई के नाम पर हर साल लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन हकीकत में हालात बद से बदतर हैं। “न सफाई दिखती है, न जिम्मेदारी”—यह कहना है गांव के लोगों का, जो अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। मामले को और गंभीर बनाते हैं ग्राम प्रधान, प्रधानपति इंद्रपाल और सचिव अमित दुबे पर लगे पक्षपात के आरोप। ग्रामीणों का कहना है कि एक खास परिवार को फायदा पहुंचाने के लिए जानबूझकर रास्ता अधूरा छोड़ा गया है, ताकि उस परिवार की गंदगी उसी रास्ते पर बनी रहे और उस पर कोई कार्रवाई न हो।

ग्रामीणों का सीधा आरोप है—“एक परिवार के वोट के लिए पूरे गांव की जिंदगी दांव पर लगा दी गई है।” यह कथन गांव में बढ़ते आक्रोश और असंतोष की साफ झलक देता है। सवाल यह है कि जब सरकारी खजाने से लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, तो आखिर जिम्मेदारों की जवाबदेही क्यों तय नहीं हो रही? क्या विकास केवल कागजों पर ही सीमित रहेगा या फिर धुंधरी के ग्रामीणों को भी स्वच्छ और सम्मानजनक जीवन का अधिकार मिलेगा? अब ग्रामीणों ने प्रशासन से कड़ी कार्रवाई, निष्पक्ष जांच और तत्काल अधूरे रास्ते को पूरा कराने की मांग की है। अगर जल्द समाधान नहीं हुआ, तो यह मामला बड़े जनआंदोलन का रूप भी ले सकता है।
 

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