सुबह की धुंध अभी पूरी तरह छंटी भी नहीं थी कि महोफ जंगल से सटी कॉलोनी के पास मौत की आहट सुनाई दे गई। जंगल—जो कभी जीवन का सहारा था—उसी जंगल ने इस बार


सुबह की धुंध अभी पूरी तरह छंटी भी नहीं थी कि महोफ जंगल से सटी कॉलोनी के पास मौत की आहट सुनाई दे गई। जंगल—जो कभी जीवन का सहारा था—उसी जंगल ने इस बार जीवन छीन लिया। पीलीभीत टाइगर रिजर्व की महोफ वन रेंज में 65 वर्षीय पारुल राय का क्षत-विक्षत शव मिलने से पूरा इलाका सन्न रह गया। हैरानी की बात यह कि शव कॉलोनी से महज 200 मीटर की दूरी पर पड़ा मिला—मानो जंगल और बस्ती के बीच की रेखा पूरी तरह मिट चुकी हो।

मंगलवार दोपहर पारुल राय रोज़ की तरह लकड़ी बीनने जंगल गई थीं। यह उनकी दिनचर्या थी—जंगल उनके लिए डर नहीं, ज़रूरत था। लेकिन उस दिन जंगल में कोई और ही इंतज़ार कर रहा था। देर शाम तक जब वह घर नहीं लौटीं, तो परिवार की बेचैनी बढ़ गई। पति सुकुमार राय और परिजन रात भर जंगल के किनारे-किनारे भटकते रहे, लेकिन अंधेरा और सन्नाटा हर जवाब को निगल गया। बुधवार सुबह करीब 7:30 बजे बग्गा बीट क्षेत्र में ग्रामीणों की नज़र जंगल के भीतर पड़े शव पर पड़ी। दृश्य इतना भयावह था कि देखने वालों की रूह कांप उठी। महिला के गले और पेट का मांस गायब था, गले की हड्डी टूटी हुई, और शरीर पर गहरे पंजों के निशान साफ़ बता रहे थे कि यह किसी सामान्य जानवर का हमला नहीं था। टूटी हुई झाड़ियाँ इस बात की गवाही दे रही थीं कि यहां ज़िंदगी और मौत के बीच आखिरी संघर्ष हुआ था।

वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक, बाघ अक्सर झाड़ियों में छिपकर अचानक हमला करता है। आशंका है कि पारुल राय पर भी इसी तरह झपट्टा मारा गया—गला दबोचकर उन्हें जंगल के भीतर घसीटा गया और वहीं मौत के घाट उतार दिया गया। यह हमला सिर्फ एक इंसान पर नहीं था, बल्कि उस भरोसे पर था, जो ग्रामीण जंगल के साथ जीते आए हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि महोफ इलाके में कई दिनों से बाघ की मूवमेंट देखी जा रही थी। मवेशियों पर हमले की घटनाएं भी हुईं, लेकिन निगरानी और गश्त कागज़ों से बाहर नहीं आ सकी। कॉलोनी के इतने पास इस तरह की घटना ने वन विभाग की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग और पुलिस मौके पर पहुंची। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।


पीलीभीत टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर मनीष सिंह के अनुसार, प्रथम दृष्टया मामला वन्यजीव के हमले का प्रतीत होता है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही मौत के कारणों की पुष्टि हो सकेगी। हालांकि शरीर पर मिले घाव किसी बड़े शिकारी की ओर साफ़ इशारा कर रहे हैं।

महोफ कॉलोनी और आसपास के गांवों में अब सन्नाटा है। महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे जंगल की ओर देखने से भी डर रहे हैं। ग्रामीणों ने तत्काल पिंजरा लगाने, गश्त बढ़ाने, और पीड़ित परिवार को शीघ्र मुआवजा देने की मांग की है।


यह घटना सिर्फ एक मौत की कहानी नहीं है। यह उस बढ़ते मानव-बाघ संघर्ष की तस्वीर है, जिसमें जंगल सिमट रहा है और बस्तियां फैल रही हैं। सवाल यह नहीं कि बाघ दोषी है या इंसान—सवाल यह है कि क्या हम इस टकराव को रोकने के लिए वाकई तैयार है?

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