दिव्यांग के घर घुसकर तथाकथित पत्रकार की गुंडागर्दी, महिलाओं से अभद्रता, मोबाइल व ब्लूटूथ हैंडसेट जलाया; पीड़ित ने DM को दी शिकायत, जान का खतरा बताया
राजकुमार वर्मा
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) गोरखपुर की ट्रॉमा और इमरजेंसी सेवाओं को लेकर गंभीर और सनसनीखेज आरोप सामने आए हैं। यहां कार्य कर चुके एक जूनियर डॉक्टर ने उच्च अधिकारियों को ई-मेल भेजकर इमरजेंसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
डॉक्टर का आरोप है कि इमरजेंसी में कई जूनियर और इंटर्न डॉक्टरों को सही उपचार तक की जानकारी नहीं है, जिससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ रही है।
रेड जोन में ‘या तो मौत, या सर्जरी’
मेल में दावा किया गया है कि रेड जोन में आने वाले अधिकांश मरीज या तो दम तोड़ देते हैं या फिर उन्हें सीधे सर्जिकल विभाग भेज दिया जाता है। हाल ही में एक मरीज को हड्डी विभाग में इसलिए भर्ती करना पड़ा क्योंकि ट्रॉमा में इंटर्न ने घाव की ठीक से सफाई नहीं की, जिससे संक्रमण फैल गया। यही घटना इस ई-मेल की वजह बनी।
गंदे औजारों से सिलाई का आरोप
जूनियर डॉक्टर ने आरोप लगाया है कि मरीजों की सिलाई में इस्तेमाल होने वाले औजार गंदे होते हैं। तस्वीरों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि औजारों पर दिख रहा पीला रंग फॉर्मेलिन नहीं, बल्कि खून और आयोडीन का है और इन्हें हफ्तों तक बदला नहीं जाता।
दौरा पड़ते मरीज के कान में टांके
एक अन्य गंभीर आरोप में कहा गया है कि दौरा पड़ रहे एक मरीज के मुंह से झाग निकल रहा था, इसके बावजूद इंटर्न उसके कान में टांके लगाने में लगे रहे। बाद में सीटी स्कैन कराने पर पता चला कि मरीज के मस्तिष्क में खून बह गया था।
13 वर्षीय बच्चे का पैर सड़ने का आरोप
जूनियर डॉक्टर ने 13 साल के एक बच्चे का उदाहरण देते हुए लिखा कि नॉन-एकेडमिक जूनियर डॉक्टर द्वारा घाव के साथ लापरवाही से काम करने के कारण बच्चे के पूरे निचले अंग की आधी त्वचा मृत हो गई। इलाज के बाद जब मरीज चला गया तो उसे ‘लामा’ (इलाज छोड़े जाना) बताकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया गया।
प्लास्टिक सर्जन होने के बावजूद इलाज नहीं
मेल ने यह भी आरोप लगाया गया है कि प्लास्टिक सर्जन कंसल्टेंट मौजूद होने के बावजूद मरीजों को उचित देखभाल नहीं मिलती। इंटर्न रात में ही फाइलें भर देते हैं और पूरे इलाज के दौरान वही दवाएं चलती रहती हैं। इमरजेंसी में कोई प्रभावी समीक्षा प्रणाली न होने से मरीजों की हालत बिगड़ती जाती है।
सिर में चोट, फिर भी सीटी स्कैन नहीं
एक मामले में बताया गया कि सिर में चोट और बार-बार उल्टी कर रहे मरीज का सीटी स्कैन नहीं कराया गया। नॉन-एकेडमिक जूनियर डॉक्टर उसे दूसरे विभाग में भर्ती कराने में लगे रहे। इस दौरान मरीज की हालत बिगड़ी, आंखों की मूवमेंट बंद हो गई और शरीर के एक हिस्से में संवेदना समाप्त हो गई।
‘कॉपी-पेस्ट’ इलाज और संक्रमण का खतरा
जूनियर डॉक्टर के अनुसार हर मरीज के बेड हेड टिकट पर एक जैसी दवाएं और उपचार लिख दिए जाते हैं। उपकरणों की हफ्तों तक सफाई नहीं होती, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है। उन्होंने यह भी लिखा कि बिना किसी वरिष्ठ डॉक्टर की निगरानी के ड्रेसिंग करने में उन्हें असहजता महसूस होती है।
ट्रॉमा प्रक्रिया कक्ष में स्वच्छता का अभाव
मेल में ट्रॉमा प्रक्रिया कक्ष में साफ-सफाई के अभाव का भी जिक्र है। फोर्सेप्स जैसे उपकरण गंदे रहते हैं और गंभीर रूप से जले मरीजों की ड्रेसिंग बिना किसी सीनियर रेजिडेंट या कंसल्टेंट की निगरानी के कराई जाती है। डॉक्टर ने इसे अपने लिए नैतिक और पेशेवर रूप से असहज बताया।
इन आरोपों के सामने आने के बाद एम्स गोरखपुर की इमरजेंसी और ट्रॉमा सेवाओं की गुणवत्ता पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। अब देखना होगा कि संस्थान प्रबंधन इन गंभीर आरोपों पर क्या कार्रवाई करता है और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।
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राजकुमार वर्मा
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