जहाँ प्रदेश सरकार गांवों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने के लिए डिजिटल क्रांति की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है, वहीं ग्राम पंचायत लच्छीपुर में “डिजिटल लाइब्रेरी


 

ब्यूरो रिपोर्ट , सीतापुर।

जहाँ प्रदेश सरकार गांवों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने के लिए डिजिटल क्रांति की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है, वहीं ग्राम पंचायत लच्छीपुर में “डिजिटल लाइब्रेरी” योजना में बड़े पैमाने पर धन गबन का मामला सामने आया है। सरकार ने राज्य की 22,700 ग्राम पंचायतों में डिजिटल लाइब्रेरी स्थापित करने का सपना दिखाया था, लेकिन लच्छीपुर की हकीकत इस योजना के साथ की गई बड़ी लापरवाही और भ्रष्टाचार की पोल खोलती है।

ग्रामीणों की दबी जुबान में बड़ा आरोप —
डिजिटल लाइब्रेरी के नाम पर 1,14,340 रुपये हजम!

ग्राम पंचायत लच्छीपुर में योजना के तहत जारी ₹1,14,340 की राशि किताबें, कंप्यूटर, प्रिंटर, इंटरनेट सुविधा और अन्य डिजिटल संसाधनों पर खर्च होनी थी, ताकि गांव के बच्चों को भी शहरों की तरह आधुनिक शिक्षा मिल सके। लेकिन हकीकत में न कंप्यूटर, न प्रिंटर, न इंटरनेट—लाइब्रेरी नाम की कोई सुविधा ज़मीन पर नहीं दिखती।

ग्रामीणों का आरोप है कि प्रधान और पंचायत सचिव ने मिलकर इस धनराशि को गबन कर लिया है। लाइब्रेरी के नाम पर न तो कोई उपकरण खरीदा गया और न ही कोई अध्ययन सामग्री उपलब्ध है। पंचायत भवन में महीनों से ताला लटक रहा है, और पंचायत सहायक भी लंबे समय से नदारद है।

पंचायत सहायक की चौंकाने वाली बात—
“सीपीयू सचिव अपने पास रखते हैं… सिर्फ सैलरी लो, बाकी से मतलब मत रखो”

जब पंचायत सहायक से बात की गई तो उन्होंने खुद स्वीकार किया कि कंप्यूटर सिस्टम का सीपीयू सचिव अपने पास ब्लॉक मुख्यालय पर रखते हैं। सचिव का सीधा कहना है कि “आपको सिर्फ सैलरी से मतलब है, सिस्टम से हम कुछ भी करें—आपको लेना देना नहीं।”
यह बयान इस पूरे प्रकरण पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

गांव के बच्चों का भविष्य दांव पर —
सरकार के सपनों पर पानी फेर रही पंचायत!

“विकसित भारत 2047” के लक्ष्य के तहत डिजिटल शिक्षा को गांवों तक पहुंचाना सरकार की प्राथमिकता है। लेकिन लच्छीपुर में डिजिटल लाइब्रेरी न होने से बच्चे ऑनलाइन शिक्षा, ई-बुक्स, ऑडियो-वीडियो लेक्चर और डिजिटल संसाधनों के लाभ से पूरी तरह वंचित हैं।

ग्रामीणों को अपने जन्म प्रमाण पत्र, मृत्यु प्रमाण पत्र, जाति, आय, निवास प्रमाण पत्र जैसी बुनियादी सेवाओं के लिए भी ब्लॉक मुख्यालय के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। पंचायत भवन में कोई कर्मचारी मौजूद नहीं रहता—यह स्थिति बेहद शर्मनाक और चिंता का विषय है।

अब सवाल यह है—
क्या इस घोटाले पर कोई कार्रवाई होगी?
या कागजी खानापूर्ति कर ली जाएगी?

खबर प्रकाशित होने के बाद जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही तय होगी या फिर हमेशा की तरह सिर्फ स्पष्टीकरण लेकर मामला दबा दिया जाएगा— यह देखना दिलचस्प होगा।

अंत में—
लच्छीपुर के बच्चों का डिजिटल भविष्य अनिश्चित है,
और जिम्मेदारों की चुप्पी खुद एक बड़ा सवाल बन गई है।

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