AIMPLB ने SC के फैसले को शरीयत के खिलाफ बताया है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि अदालत का फैसला शरीयत से कॉन्फ्लिक्ट करता है और मुसलमान शरिया कानून को मानने के लिए पाबंद है.


मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कानूनी लड़ाई लड़ेगा. रविवार को दिल्ली में हुई बैठक के बाद AIMPLB के प्रवक्ता ने इसकी जानकारी दी. इसके अलावा बोर्ड ने बैठक में UCC और वक्फ एक्ट को लेकर भी प्रस्ताव पास किया है. बैठक में AIMIM नेता असदुद्दीन ओवैसी समेत मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के 51 सदस्य शामिल हुए.

 

पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले की 3 बड़ी बातें

1. SC का फैसला शरिया कानून के खिलाफ

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शरियत के खिलाफ बताया है. AIMPLB के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला शरिया कानून से कॉन्फ्लिक्ट करता है. उन्होंने कहा कि मुसलमान शरिया कानून का पाबंद है. वो ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकता जो शरिया से कॉन्फ्लिक्ट करता हो. उन्होंने कहा कि संविधान के आर्टिकल 25 में हमें अपने मजहब के अनुसार जिंदगी गुजारने की आजादी दी गई है, ये हमारा मौलिक अधिकार है. वहीं AIMPLB की एग्जीक्यूटिव मेंबर मुनीसा ने भी SC के फैसले को शरीयत के खिलाफ बताया है. उन्होंने कहा है कि यह महिलाओं के हक में नहीं है.

 

2. महिलाओं के लिए मुसीबत साबित होगा फैसला

AIMPLB का कहना है कि सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से मुस्लिम महिलाओं को कोई फायदा नहीं होगा बल्कि ये फैसला उनके लिए एक नई मुसीबत पैदा कर देगा. बोर्ड का कहना है कि अगर किसी शख्स को तलाक के बावजूद आजीवन पत्नी का खर्चा उठाना पड़ेगा तो फिर वो तलाक क्यों देगा? बोर्ड के प्रवक्ता ने दावा किया है कि इससे मुस्लिम महिलाओं को आजीवन मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. उनका पति उन्हें तलाक न देकर आजीवन परेशान करता रहेगा.

 

3. फैसले के खिलाफ लड़ेंगे कानूनी लड़ाई

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में तय किया गया है कि गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगे. बैठक में वर्किंग कमेटी ने बोर्ड को अथॉरिटी दी है कि लीगल कमेटी से बात कर इस फैसले को रोलबैक करने की दिशा में काम किया जाए. बोर्ड के प्रवक्ता ने कहा है कि हमने ये महसूस किया है कि देश में हिंदुओं के लिए हिंदू कोड बिल है और मुसलमानों के लिए शरिया लॉ है. कोर्ट का ये फैसला शरियत से कॉन्फ्लिक्ट करता है लिहाजा हम पूरी कोशिश करेंगे कि इस फैसले को रोलबैक किया जाए.

 

गुजारा भत्ता पर क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के एक मामले में सुनवाई करते हुए कहा था कि मुस्लिम महिला भी CrPC की धारा 125 (वर्तमान BNSS की धारा 144) के तहत गुजारा भत्ता मांग सकती है. कोर्ट ने इस धारा को धर्मनिरपेक्ष बताते हुए कहा था कि हमारे संविधान में हर धर्म की महिला को समान हक देने का कानून है. इसलिए मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता पाने का उतना ही अधिकार है, जितना कि दूसरे धर्म की महिलाओं को. दरअसल तेलंगाना के एक शख्स ने धारा 125 के तहत अपनी तलाकशुदा पत्नी को भरण-पोषण दिए जाने को कोर्ट में चुनौती दी थी. जिसे जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने खारिज कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का देश के तमाम बड़े मुस्लिम संगठन इसका विरोध कर रहे हैं. जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी कोर्ट के फैसले के खिलाफ नाराजगी जताई थी. जमीयत ने इसे शरिया कानून में दखल बताया था. वहीं आज AIMPLB ने बैठक कर साफ कर दिया है कि वो इस फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने के मूड में है.

 

CrPC की धारा 125 में क्या है प्रावधान?

CrPC की धारा 125 (अब BNSS की धारा 144) पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण पोषण का प्रावधान है. इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति जिसके पास आजीविका के पर्याप्त साधन हैं वह पत्नी, बच्चों और माता-पिता को भरण-पोषण देने से इनकार नहीं कर सकता है. इसके तहत अगर पत्नी (जिसमें तलाकशुदा पत्नी भी शामिल है) अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है तो वह अपने पति से भरण-पोषण मांगने की हकदार होगी.

 

गुजारा भत्ता मामले में क्या चाहते हैं मुस्लिम संगठन?

इस मामले में मुस्लिम संगठनों का मानना है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता शरीयत के हिसाब से ही दिया जाए. दरअसल 1985 में शाह बानो केस के बाद राजीव गांधी सरकार ने एक नया कानून बनाया था. मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम 1986 के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भरण-पोषण मांगने के लिए एक खास सिस्टम प्रदान किया गया. 1986 में बने कानून के मुताबिक तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भरण-पोषण इद्दत (90 दिन) तक ही सीमित था, साथ ही भरण-पोषण के लिए उन्हें मिलने वाली रकम मेहर की रकम तक ही सीमित थी. मुस्लिम संगठन चाहते हैं तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को इसी कानून के तहत गुजारा भत्ता दिया जाए ना कि CrPC की धारा 125 के तहत.

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