शिवहरि शर्मा संवाददाता


एकादशी पर्व के उपलक्ष में कस्बा शाही में सिद्ध बाबा मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन आचार्य सच्चिदानंद महाराज ने महाराज भरत के पूर्व जन्म की कथा का बड़े ही मार्मिक ढंग से वर्णन करते हुए कहा कि भगवान ॠषभदेव  के पुत्र भरत जी का मन राजपाट में लगने की बजाय भगवान की स्तुति तप तथा पूजा पाठ में अधिक लगता था। लेकिन एक दिन अचानक एक हिरनी नदी में वहती हुई जा रही थी उसके साथ उसका छोटा सा बच्चा भी है जिसे भरत जी ने गंगा में छलांग लगाकर बच्चे को बचा लिया भरत जी हिरनी के बच्चे के मोह में फंसे भगवान को ही भूल गए। इसीलिए दूसरे जन्म में इन्हें हिरण का जन्म प्राप्त हुआ लेकिन उन्हें अपने पूर्व जन्म गलती का एहसास होने की वजह से इस शरीर को भी त्याग कर पुनः इनका तीसरा जन्म एक ब्राह्मण के यहां हुआ इस जन्म में सब त्याग कर अपने पिता की इच्छा के विपरीत चलने लगे तब इनका नाम जड़ भरत हुआ

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