बिहार पुलिस का कहना है एनकाउंटर से पहले वायरल वीडियो में भरत तिवारी के हाथ में जो पिस्टल दिखाई दे रही थी, वह अवैध थी. सवाल यह है कि क्या बिहार में लोगों की अवैध हथियारों तक इतनी आसान पहुंच है? अगर ऐसा है तो इसके पीछे क्या वजहें हैं? राज्य में अवैध हथियारों का नेटवर्क कैसे काम करता है. साथ
भोजपुर में भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद खूब बवाल मचा हुआ है. सरकार बैकफुट पर है. वह विपक्ष के अलावा अपनों की आलोचनाओं से भी घिर गई है. एनडीए के खुद के नेता इस एनकाउंटर पर सवाल उठा रहे हैं. सीएम सम्राट चौधरी ने भरत तिवारी की मुठभेड़ पर न्यायिक जांच के आदेश दे दिए हैं. 6 पुलिस वालों को सस्पेंड भी कर दिया गया है.
दरअसल, 18 जून को सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था. इसमें भोजपुर का भरत तिवारी नाम का युवक हाथ में हथियार लेकर पुलिस प्रशासन के खिलाफ नाराजगी दिखाते हुए भी दिख रहा है. वीडियो के आखिर हिस्से में वह पुलिस के सामने हथियार फेंकते दिख रहा है. लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने बिहार पुलिस की साख पर बट्टा लगा दिया और बिहार सरकार की गले का फांस बन गया. दरअसल, पुलिस ने भरत तिवारी का एनकाउंटर कर दिया.
पुलिस के मुताबिक वीडियो में भरत तिवारी के हाथ में जो पिस्टल नजर आया था, वह भी अवैध थी. सवाल यह है कि क्या बिहार में लोगों की अवैध हथियारों तक इतनी आसान पहुंच है? अगर ऐसा है तो इसके पीछे क्या वजहें हैं? राज्य में अवैध हथियारों का नेटवर्क कैसे काम करता है. साथ ही इसका राज्य में हत्या, रंगदारी, फिरौती के लिए अपहरण, लूट, डकैती, बैंक डकैती और सड़क पर होने वाली आपराधिक वारदातों से कितना गहरा संबंध है.
मुख्य बातें
2017 से 2022 के बीच हिंसक अपराधों के मामले में बिहार लगातार शीर्ष पांच राज्यों में शामिल रहा है.
2015 से 2024 तक बिहार पुलिस ने साल औसतन 3,628 अवैध हथियार और 17,239 गोला-बारूद बरामद किए.
2015-2024 के अवैध गन बनाने वाली फैक्ट्रीज की संख्या 2018 में 13 से बढ़कर 2023 में 70 तक पहुंच गई.
अवैध हथियारों के चलते कैसे बिहार में बढ़ी अपराधिक घटनाएं?
स्टेट क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के 2015 से 2024 तक के रिपोर्ट में बिहार पुलिस ने माना है कि राज्य में हत्या, फिरौती के लिए अपहरण, डकैती, लूट, बैंक डकैती और सड़क पर डकैती जैसी घटनाओं में बढ़ोतरी का सीधा संबंध अवैध हथियारों और गोला-बारूद की बढ़ती बिक्री बड़ी वजह है.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक 2017 से 2022 के बीच हिंसक अपराधों के मामले में बिहार लगातार शीर्ष पांच राज्यों में शामिल रहा है. वहीं,स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के इस रिपोर्ट के मुताबिक हर साल औसतन 82 घटनाओं के साथ पटना हिंसक अपराधों में सबसे आगे है.
फिर पूर्वी चंपारण (49.53), सारण (44.08), गया (43.50), मुजफ़्फरपुर (39.93) और वैशाली (37.9) का नंबर आता है.हिंसक अपराधों की सबसे ज़्यादा संख्या वाले टॉप 10 जिलों में से सात पटना, मोतिहारी, मुज़फ़्फ़रपुर, वैशाली, समस्तीपुर, नालंदा और बेगूसराय उन टॉप 10 ज़िलों में भी शामिल हैं जहां आर्म्स एक्ट के तहत सबसे ज़्यादा मामले दर्ज किए गए थे.
अवैध हथियारों की बरामदगी में पटना सबसे आगे
स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (SCRB) 2015 से लेकर 2024 तक का डेटा बताता है कि बिहार में आर्म्स एक्ट के तहत हर साल औसतन 2,913 मामले दर्ज किए गए हैं. पुलिस ने हर साल औसतन 3,628 अवैध हथियार और 17,239 गोला-बारूद बरामद किए. देसी अवैध हथियारों की बरामदगी में लगातार इजाफा देखा गया. 2015 में इसकी संख्या 2,356 थी, जो 2024 में बढ़कर दोगुने से ज्यादा 4,981 हो गई थी.
अवैध देसी हथियारों की बरामदगी के जिलेवार आंकड़ों पर गौर करे तो इसमें राजधानी पटना सबसे आगे है. यहां 2015-2024 के बीच हर साल औसतन 384.4 हथियार बरामद किए गए. वहीं, दूसरे स्थान पर औसतन 222.3 हथियार के साथ मुजफ्फरपुर रहा. इस दौरान बरामद गोला-बारूद या कारतूसों की संख्या 2015 में 9,449 से बढ़कर 2024 में 23,451 हो गई थी.जिलेवार आंकड़ों में औरंगाबाद पहले नंबर पर है, उसके बाद पटना और गया का स्थान है.
स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की यह रिपोर्ट यह भी जानकारी देता है कि 2015 से लेकर 2024 के बीच बिहार में अवैध हथियार बनाने वाली फ़ैक्टरियों की संख्या में भी तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. 2015-2024 के दौरान इनकी संख्या 2018 में 13 से बढ़कर 2023 में 70 तक पहुंच गई.
इन तरीकों से बिहार में पहुंच रहे गोला-बारूद और हथियार
रिपोर्ट में बिहार में अवैध तरीकों से हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराने के तरीकों के बारे में जानकारी दी गई है. सबसे पहला तरीका है दूसरे राज्यों जैसे जम्मू-कश्मीर और नागालैंड से फर्ज़ी या जाली हथियार लाइसेंस के जरिए हथियार हासिल करना. दूसरा ज़रिया है बिहार के ग्रामीण और शहरी इलाकों में चल रही छोटे पैमाने की अवैध हथियार बनाने वाली इकाइयां. यह बड़े पैमानेमें देसी हथियार उपलब्ध कराती हैं. तीसरा तरीका धोखाधड़ी से लाइसेंस वाले स्टॉक से गोला-बारूद निकाल कर उसका कालबाजारी करना.
रिपोर्ट में सुझाव-व्यक्तिगत गोला-बारूद का कोटा घटाए
2024 तक बिहार में लगभग 78,000 लाइसेंस-धारक थे. उनमें से ज़्यादातर को हर साल 200 राउंड तक गोला-बारूद खरीदने का अधिकार है. अगर उनमें से 50 प्रतिशत भी इस अधिकार का इस्तेमाल करते हैं, तो कारतूसों की सालाना बिक्री 78 लाख राउंड तक पहुंच सकती है. इस पर कड़ी नज़र रखने की ज़रूरत है. स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि बिहार के DGP को व्यक्तिगत गोला-बारूद का कोटा सालाना 200 राउंड की सीमा से घटाकर कम से कम कर देना चाहिए. पुलिस को जम्मू-कश्मीर और नागालैंड सरकारों द्वारा जारी लाइसेंसों की भी निगरानी करनी चाहिए.
हथियारों की दुकानों और कारखानों की समीक्षा की जाए
स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में यह सुझाव भी दिया गया था कि अब तक जारी किए गए सभी लाइसेंस, हथियार और गोला-बारूद, साथ ही सभी हथियार डीलरों और बंदूक की दुकानों की जानकारी गृह मंत्रालय के हथियारों के लाइसेंस के राष्ट्रीय डेटाबेस – आर्म्स लाइसेंस जारी करने की प्रणाली (NDAL-ALIS) में 100 प्रतिशत दर्ज की जाए. राज्य भर में 80 लाइसेंस प्राप्त हथियारों की दुकानों और मुंगेर में 37 बंदूक कारखानों के कामकाज की लगातार जांच और समीक्षा की जाए.
गोला-बारूद का समय-समय पर ऑडिट हो
सुझावों में यह भी शामिल है कि अगर लाइसेंस-धारक हथियार इस्तेमाल करने या रखने में असमर्थ हो जाता है तो उसका लाइसेंस रद्द कर दिया जाए और हथियार जमा करा लिए जाए. पुलिस और अन्य सशस्त्र बलों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले गोला-बारूद का समय-समय पर ऑडिट हो. गोला-बारूद खरीदने की प्रक्रिया को आसान बनाया जाए. प्रवर्तन एजेंसियों को NDAL-ALIS को एक्सेस का अधिकार दिया जाए.
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