संत शिरोमणि गुरु रविदास जयंती पर संबोधन
राजेश कुमार सिद्धार्थ
(राष्ट्रीय अध्यक्ष – डॉ. आंबेडकर संवैधानिक महासंघ
प्रदेश उपाध्यक्ष – किसान कांग्रेस)
साथियो, भाइयो और बहनो,
आज का यह पावन अवसर केवल एक जयंती नहीं है। आज का दिन केवल दीप जलाने, माल्यार्पण करने या औपचारिक भाषण देने का दिन नहीं है। आज का दिन संत शिरोमणि गुरु रविदास की वैचारिक विरासत को आत्मसात करने, उनके संघर्षों को समझने और उनके सपनों के समाज को साकार करने का संकल्प लेने का दिन है।
संत शिरोमणि गुरु रविदास वह महान संत थे, जिन्होंने ऐसे समय में मानवता, समानता और न्याय की बात की, जब समाज जाति-पांति, ऊँच-नीच, छुआछूत और घोर अमानवीय भेदभाव से जकड़ा हुआ था। उन्होंने न केवल उस व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि अपने जीवन और वाणी से यह सिद्ध किया कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति नहीं, उसका कर्म, उसका चरित्र और उसकी मानवता है।
गुरु रविदास : बहुजन चेतना के मूल स्तंभ
साथियो,
गुरु रविदास को समझना है तो उन्हें केवल एक संत के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांतिकारी, एक दार्शनिक, और एक बहुजन विचारक के रूप में समझना होगा। उन्होंने कहा—
यह पंक्ति उस पूरी सामाजिक व्यवस्था पर करारा प्रहार है, जो मनुष्य को मनुष्य से अलग करती है। गुरु रविदास ने स्पष्ट कहा कि जाति कोई ईश्वरीय व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह मनुष्य द्वारा बनाई गई शोषण की संरचना है।
आज बहुजन समाज को यदि सच में एकजुट होना है, तो उसे गुरु रविदास की वाणी को केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं रखना होगा, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक सिद्धांत बनाना होगा।
‘बेगमपुरा’ : समानता आधारित समाज का सपना
साथियो,
गुरु रविदास ने जिस समाज की कल्पना की, उसे उन्होंने ‘बेगमपुरा’ कहा—
एक ऐसा नगर,
जहाँ कोई दुःखी नहीं,
कोई भूखा नहीं,
कोई छोटा-बड़ा नहीं,
कोई शोषित नहीं।
यह कोई कल्पना मात्र नहीं थी, बल्कि यह एक राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक घोषणापत्र था। गुरु रविदास का बेगमपुरा वही सपना है, जिसे आगे चलकर बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से वास्तविक रूप देने का प्रयास किया।
गुरु रविदास और बाबा साहेब : विचारों की अविरल धारा
साथियो,
यह संयोग नहीं है कि गुरु रविदास और बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर के विचारों में गहरी समानता दिखाई देती है। दोनों ने—
जाति व्यवस्था का विरोध किया
श्रम की गरिमा को प्रतिष्ठित किया
शिक्षा को मुक्ति का माध्यम बताया
समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की बात की
बाबा साहेब ने जो कहा—
“मैं ऐसे धर्म को नहीं मानता जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व न सिखाए”,
वही बात गुरु रविदास ने सदियों पहले अपनी वाणी में कही थी।
इसलिए मैं यह पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि
गुरु रविदास बहुजन चेतना की आत्मा हैं और बाबा साहेब उसका संवैधानिक स्वरूप।
बहुजन समाज की आज की चुनौती
साथियो,
आज बहुजन समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। जाति के नाम पर बाँटने की साजिशें, संविधान को कमजोर करने के प्रयास, किसानों, मजदूरों, दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमले—यह सब हमारे सामने है।
आज जरूरत है कि बहुजन समाज—
अपनी ऐतिहासिक विरासत को पहचाने
अपने महापुरुषों के विचारों को समझे
और संगठित होकर संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे
गुरु रविदास ने हमें डरना नहीं, झुकना नहीं, और अन्याय के सामने चुप नहीं रहना सिखाया।
किसान, मजदूर और श्रमिक : गुरु रविदास की चेतना
साथियो,
गुरु रविदास स्वयं श्रमजीवी समाज से आए थे। उन्होंने श्रम को कभी हीन नहीं माना, बल्कि उसे सम्मान दिया। आज जब किसान और मजदूर सबसे अधिक संकट में हैं, तब गुरु रविदास का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।
एक किसान का पसीना,
एक मजदूर की मेहनत,
एक श्रमिक का श्रम—
यही इस देश की असली पूँजी है।
किसान कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष के रूप में मैं यह कहना चाहता हूँ कि किसान और बहुजन समाज का संघर्ष एक है। जब तक किसान मजबूत नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा।
शिक्षा : मुक्ति का सबसे बड़ा हथियार
साथियो,
गुरु रविदास और बाबा साहेब—दोनों ने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम माना। आज बहुजन समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल है—शिक्षा तक समान पहुँच।
हमें अपने बच्चों को—
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
संवैधानिक मूल्य
वैज्ञानिक सोच
देनी होगी। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी गुरु रविदास को।
महिलाओं की समानता और सम्मान
साथियो,
गुरु रविदास की वाणी में नारी के प्रति गहरा सम्मान दिखाई देता है। बहुजन समाज तब तक आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक उसकी महिलाएँ शिक्षित, सुरक्षित और सशक्त नहीं होंगी।
नारी सम्मान कोई उपकार नहीं, बल्कि संवैधानिक और मानवीय अधिकार है।
संविधान की रक्षा : आज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी
साथियो,
आज संविधान पर खतरे मंडरा रहे हैं। संविधान को कमजोर करना, दरअसल बहुजन समाज को कमजोर करना है। इसलिए गुरु रविदास जयंती के इस पावन अवसर पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि—
हम संविधान की रक्षा करेंगे
हम लोकतंत्र की रक्षा करेंगे
हम सामाजिक न्याय की लड़ाई को कमजोर नहीं पड़ने देंगे
निष्कर्ष : गुरु रविदास का रास्ता ही भविष्य है
अंत में,
मैं यही कहना चाहता हूँ कि संत शिरोमणि गुरु रविदास केवल इतिहास नहीं हैं—वे वर्तमान और भविष्य दोनों हैं।
यदि बहुजन समाज—
जाति-पांति से ऊपर उठे
संगठित हो
शिक्षित बने
और संवैधानिक रास्ते पर चले
तो कोई ताकत हमें आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती।
आइए, इस गुरु रविदास जयंती पर हम संकल्प लें कि—
हम बेगमपुरा के सपने को संविधान के रास्ते साकार करेंगे।
हम बाबा साहेब और गुरु रविदास के विचारों को जन-जन तक पहुँचाएँगे।
जय संत शिरोमणि गुरु रविदास
जय बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर
जय संविधान
जय बहुजन समाज
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