न्याय पाने के लिए दर-दर भटकती रहती भारत खासकर उत्तरप्रदेश की जनता भारत की बिगड़ी न्याय व्यवस्था के जिम्मेदार हैं रजनीतिक एवं पूंजीवादी पार्टियां


भारत की न्याय व्यवस्था की बात करें तो आज भारत की न्याय व्यवस्था न्याय व्यवस्था इतनी ख़राब हो गई है कि जनता जुल्म की चक्की में पिस तो रही है लेकिन आवाज नहीं कर रही है यदि पीड़ित जनता आवाज कर रही है न्याय मांग रही है तो जानें जा रही हैं पीड़ित जनता को झूठे मुकदमो में फंसाया जा रहा है जेल भेजा जा रहा है खासकर उत्तरप्रदेश में 
बात करें उत्तरप्रदेश की तो उत्तरप्रदेश में ज्यादातर गरीब शोषित बंचित समाज एवं दलित, पिछड़े आदिवासियों को सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया जा रहा है उनका शोषण किया जा रहा है और उनकी जाने भी ली जा रही हैं जिसमें अहम भूमिका रक्षाकों अर्थात पुलिस की है जहाँ  पीड़ित न्याय मांगने जब पुलिस के पास जाते है तो तुरंत ही पुलिस अपनी जिम्मेदारी से मुकरते हुए टाल-मटोल करती है और रजनीतिक पार्टियों नेताओं तथा पूंजीपतियों के चमचों, दलालों के दबाव में आकर पीड़ितों को न्याय नहीं दिला दिला पाती है और न्याय या तो कागजो का दिखावा होता या फिर न्याय भरी भरकम रकम देने के बाद पुलिस पीड़ितों से रकम की बसूली करती है बसूली नहीं होने पर पुलिस या तो पीड़ितों पर फैसले का दबाव बनाकर फैसला लिखवा देती है या फिर हितैशियों से मोटी रकम लेकर पीड़ित को धमका कर मामलों को रफा-दफा कर देती है आज के समय में यदि कोई पीड़ित पुलिस के पास अपनी रिपोर्ट लिखवाने जाता है तो पुलिस पहले पीड़ित को धमकाती है बाद में किसी बिचपई को बीच में डाल कर बिचपई के द्वारा पीड़ित से रकम की मांग करती है और कहती है कि हमारी गाड़ी तेल से चलती है पानी से नहीं न्याय चाहिए तो पैसे तो देंनें ही पड़ेंगे, पैसे नहीं दे पाने पर पीड़ित की कोई सुनबाई नहीं होती है उसे धमकाकर गली-गलौच कर शांत बैठा दिया जाता है
जब चौकी और थाने का यह हाल है तो अन्य बड़े-बड़े न्याय के दरबाजे जहाँ खुले हैं वहाँ क्या हाल होगा वहाँ तो और भी बड़े  बड़े न्याय के ठेकेदार बैठे हुए हैं यहाँ पर बात हो रही है वकीलों की जहाँ बगैर वकालत नामा, फीस के कुछ भी होने वाला नहीं है अब सोंचने वाली बात है ऐसी है भारत की न्याय व्यवस्था
अब बात करते हैं अदालतों की जहाँ पीड़ित को न्याय मिलने तथा दोषियों को सजा मिलने में पूरी उम्र गुजर जाती है तारीख पे तारीख मिलती रहती है और आखिर में जब पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने तथा दोषियों सजा मिलने का बक्त आता है तक या तो पीड़ित की मृत्यु हो चुकी होती है या फिर दोषी की मृत्यु 
ऐसी है भारत की न्याय व्यवस्था
अगर बात की जाए जमीनी विवादों के न्याय की तो उसमे भी प्रार्थी हकदार अपनी पूरी उम्र भर मुकद्दमा लड़ता रहता है और अंत में एक दिन उसकी मृत्यु हो जाती है जिसके कारण मुकद्दमा रद्द हो जाता है और प्रॉपर्टीयों पर बेहकदारों का कब्ज़ा आबाद रहता है 
ऐसी है भारत की न्याय व्यवस्था

और अब चल कर नजर डालते हैं गाओं पर
कहा जाता है कि गांव में स्वर्ग बसता है लेकिन अब ये बातें झूंठी साबित हो रही हैं अब गाँव में भी कुछ ऐसे हराम की खाने वाले चमचे दलाल पैदाहो चुके हैं जो जनता के प्रतिनिधियों के कान फूँकने का का करते हैं जिन्होंने जनता के प्रत्यानिधियों के कान भर-भर कर गाँव के विकास का विनाश कर कर दिया है और जनता के प्रतिनिधियोंको मालामाल कर साथ में अपने को भी मालामाल कर रहे हैं गाँव के गरीबों तथा शोषित बंचितों एवं बिकलांग और असहाय लोगों को सरकारी आवास नहीं और पूंजी पतियों धनवानो को सरकारी आवास मिलते हैं और पूंजीपतियों, धनवानो को ही शौचालय मिलते हैं जिससे गरीब असहाय बिकलांग और शोषित बंचित समाज के बच्चे बुजुर्ग बेटियां और महिलाएं गाँव के बाहर जंगल में सौंच को जाते हैं जिसके कारण कभी न कभी कहीं न कहीं किसी न किसी हादसे का शिकार हो जाते हैं पूँजीपतियों तथा धनबानों को ही सौंचालय भी मिलते हैं जिनका वह लोग इस्तेमाल न करके उसमें उपले, ईंधन भरने का काम करते हैं जिसका बिरोध करने पर प्रतिनिधियों के चमचे, दलाल धमकाते हुए बोलते हैं कि तुम लोगों नें तो वोट दूसरों को दिये हैं तो आवास, सौंचायल कहाँ से मिल जायेगा अब या तो पैसे दो तो काम होगा या फिर हाँथ पर हाँथ रख कर बैठे रहो किसी भी काम की उम्मीद मत करना यह सुनकर बेचारे चुप चाप शांत होकर बैठ जाते हैं और गरीबी में जीवन गुजारने को विवश हैं
ऐसी हैं हमारे भारत की न्याय व्यवस्था
जल्द ही केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इस बिगड़ी हुई व्यवस्था विचार विमर्श कर ध्यान देना चाहिए और सभी प्रशासनिक अधिकारीयों और कर्मचारियों तथा सभी ऑफिस,दफ्तरों को तथा पुलिस विभाग को सख्त से सख्त सुधार करने के आदेश देने चाहिए जिससे की दलित,पिछड़े आदिवासी एवं शोषित बंचित और गरीब असहाय,कमजोर जनता को समय से न्याय मिल सके

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