आज पहलगाम की वो सुबह कालिख से धूसर हो गई,


*आतंकवाद और राजनीति: एक स्याह सच्चाई या संयोग का खेल?*  

आज पहलगाम की वो सुबह कालिख से धूसर हो गई, जहाँ एक व्यवसायी की निर्मम हत्या ने फिर से याद दिला दिया कि आतंकवाद का भूत भारत की सीमाओं पर कितना मुंह बाए खड़ा है। लेकिन इस घटना के साथ ही सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में एक पुराना सवाल फिर उभर आया: *"क्या आतंकवादी घटनाएँ किसी विशिष्ट राजनीतिक दल के शासनकाल में ज्यादा होती हैं?"*  

### इतिहास के पन्नों से: वो काले दिन  
उपरोक्त सूची में गिनाए गए हमले—कंधार हाइजैक (1999), कारगिल युद्ध (1999), संसद पर हमला (2001), अक्षरधाम (2002), गोधरा कांड (2002), रघुनाथ मंदिर हमले (2002), पुलवामा (2019), पठानकोट (2016)—ये सभी घटनाएँ भाजपा के शासनकाल में घटीं। ये तथ्य एक ऐसा पैटर्न दिखाते हैं जो चौंकाता है। क्या यह महज संयोग है, या फिर कोई गहरी साजिश? या फिर यह सवाल उठाने वालों की राजनीतिक मंशा?  

### चुनावी कैलेंडर और आतंकवाद: एक अंधेरा नाता?  
जब हम इन हमलों की तारीखों को उस समय होने वाले चुनावों से जोड़कर देखते हैं, तो एक विचित्र समानता नज़र आती है। उदाहरण के लिए:  
- *2002 गोधरा कांड* के बाद गुजरात में चुनाव हुए और भाजपा ने जबरदस्त जीत दर्ज की।  
- *2019 पुलवामा हमला* के बाद देशभर में "राष्ट्रवाद" की लहर उठी, जिसने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया।  
- *2001 संसद हमले* के बाद भाजपा ने "सख्त सुरक्षा नीति" का नारा देकर अपनी छवि गढ़ी।  

क्या यह सब महज संयोग है, या फिर आतंकवाद को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है? यह सवाल हर नागरिक को झकझोर देने वाला है।  

### सवालों के घेरे में सत्ता की भूमिका  
भाजपा के समर्थक इस सूची को "ऐतिहासिक संयोग" बताते हैं और दुश्मन देशों की साजिशों पर ज़ोर देते हैं। वहीं, विपक्षी दल इस पर सवाल उठाते हैं कि क्या सत्ता में बैठी सरकारें जानबूझकर सुरक्षा तंत्र को ढीला छोड़ देती हैं ताकि संकट पैदा हो और "मजबूत नेता" की छवि बने?  

लेकिन यहाँ एक और पहलू है: *आतंकवाद किसी एक दल की मोहताज घटना नहीं।* 1993 मुंबई ब्लास्ट, 2008 मुंबई हमले, या 2011 दिल्ली बम धमाके जैसी घटनाएँ कांग्रेस के शासन में हुईं। यानी, आतंकवाद का भूत हर सरकार के सिर पर मंडराता रहा है।  

### क्या है समाधान?  
1. *राजनीति से ऊपर उठकर सोचें:* आतंकवाद को किसी एक दल के खाते में डालना खतरनाक है। यह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है।  
2. *सुरक्षा तंत्र का सशक्तिकरण:* चाहे कोई भी सरकार हो, खुफिया एजेंसियों को मजबूत करने, सीमा प्रबंधन और तकनीकी उन्नयन पर ध्यान देना होगा।  
3. *जनता को जागरूक बनाना:* आतंकवाद के पीछे की शक्तियाँ तभी कमजोर होंगी जब समाज का हर वर्ग सतर्क और एकजुट होगा।  

### निष्कर्ष: अतीत से सबक लें, भविष्य को सँवारें  
आतंकवाद को राजनीतिक हथियार बनाना देश के लिए घातक है। पहलगाम की ताजा घटना हमें याद दिलाती है कि दुश्मन अभी भी हमारी नींद में खलल डालने को तैयार है। ऐसे में, सवाल यह नहीं कि "किसके शासन में कितने हमले हुए," बल्कि यह है कि *"हम एक राष्ट्र के रूप में इस चुनौती से कैसे निपटेंगे?"*  

आइए, इन हमलों को केवल "चुनावी मुद्दा" बनाने की बजाय, एक ऐसी राष्ट्रीय नीति पर सहमति बनाएँ जहाँ सुरक्षा हो अधिकारियों का काम और राजनीति हो देशहित की भाषा। क्योंकि, जब तक हम "भाजपा vs कांग्रेस" के दलदल में फँसे रहेंगे, तब तक आतंकवाद की छाया हमारे सिर पर मँडराती रहेगी।  

*जय हिन्द, जय एकता!*

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