मृदा एवं मानव स्वास्थ्य हेतु गाजर घास का प्रबंधन जरूरी| डॉ अरविंद कुमार जलालाबाद  कन्नौज-  कृषि विज्ञान केंद्र 


मृदा एवं मानव स्वास्थ्य हेतु गाजर घास का प्रबंधन जरूरी| डॉ अरविंद कुमार
जलालाबाद  कन्नौज-  कृषि विज्ञान केंद्र 

गाजर घास का प्रकोप मुख्यत सड़कों के किनारे तथा बेकार भूमियों में होता है। परन्तु कहीं-कहीं खेती की जाने वाली भूमिओ में विभिन्न फसलों के साथ उगते दिखाई देते है। गाजर पास के सम्पर्क में आने पर मनुष्यों में चर्म रोग, दमा, क्षय रोग, सूजन आदि हो जाते हैं। पशुओं में भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। गाजर घास एक राष्ट्रीय समस्या है जिसका नियंत्रण करना नितांत आवश्यक है।

इसके नियंत्रण हेतु पैराक्वाट डाइक्लोराइड 24 प्रतिशत एस.एल. की 4-5 लीटर प्रति है मात्रा को 700-800 लीटर में पानी में घोलकर अथवा ग्लाइफोसेट 4 प्रतिशत एसएल की 4-5 लीटर प्रति है, मात्रा अथवा 2-4 डी सोडियम लवण 80 प्रतिशत डब्लू.पी. की 1.0 किया. प्रति हे. मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोलकर गाजर घास के पौधों में फूल आने से पहले छिड़काव करना चाहिए। गाजर घास के जमाव से पूर्व एट्राजिन 50 प्रतिशत डब्लू.पी. को 2-3 किलोग्राम प्रति हे. मात्रा का 500-600 लीटर पानी में घोल कर खाली भूमि में छिड़काव करने से इसका जमाव ही नहीं होता है।

गाजर घास के नियंत्रण के लिए जाइगोग्रामा बाइकोलोरेटा कीट काफी प्रभावी पाया गया है। इस कीट को जुलाई-अगस्त के महीन में पौधों पर छोड़ने से उनको खाकर पूरी तरह नष्ट कर देते है। इस कीट के बारे में चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर के कीट विज्ञान विभाग ',  राष्ट्रीय खरपतवार विज्ञान शोध केन्द्र, आधारताल, जबलपुर (म.प्र.) एव कृषि विज्ञान केंद्र कन्नौज से अधिक जानकारी प्राप्त ही जा सकती है।

नवीनतम न्यूज़ अपडेट्स के लिए Facebook, Instagram, Twitter पर हमें फॉलो करें और लेटेस्ट वीडियोज़ के लिए हमारे YouTube चैनल को भी सब्सक्राइब करें।


Leave a Comment:

महत्वपूर्ण सूचना -

भारत सरकार की नई आईटी पॉलिसी के तहत किसी भी विषय/ व्यक्ति विशेष, समुदाय, धर्म तथा देश के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी दंडनीय अपराध है। इस प्रकार की टिप्पणी पर कानूनी कार्रवाई (सजा या अर्थदंड अथवा दोनों) का प्रावधान है। अत: इस फोरम में भेजे गए किसी भी टिप्पणी की जिम्मेदारी पूर्णत: लेखक की होगी।