मायावती , मुलायम, नितीश , लालू , ममता, शरद पँवार इन सभी को मोदी से पहले या आसपास ही राजनैतिक शुरूआत मिली । इन सब ने प्रधानमंत्री होने के सपने देखे । पर इनमे से कोई भी राजनैतिक कद में आज मोदी का दशमांश भी नही । क्यो ?
क्योंकि इनके उद्देश्य छोटे थे । इनकी राजनीति सीमित थी एक क्षेत्र या समाज के एक छोटे वर्ग तक। ये जोड तोड से हर अवसर का लाभ उठाकर और सही अवसर मिलने पर प्रधानमंत्री पद की प्रतीक्षा में थे ।
वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक सदी से एक ही उद्देश्य को लेकर कार्यरत है । वह उद्देश्य है , राष्ट्रनिर्माण। जातिवाद समाप्त करके हिंदू समाज को एकजुट करना । भारतीय होने पर गौरव हो ऐसा समाज बनाना । ये एक बडा और अत्यन्त कठिन उद्देश्य है । अनेक वर्षो तक वांछित परिणाम नही मिले पर प्रयास चलता रहा ।
यद्यपि प्रत्याशी चुनते समय भारतीय जनता पार्टी जातिगत समीकरण को ध्यान में रखती है पर उसकी दूरगामी नीतियों में एकजुट हिंदू समाज है । अन्य पार्टी जहाँ वोट बैंक को बचाकर रखने की राजनीति करती है वही भाजपा अपना प्रभाव बढाने पर काम करती है । सारे हथकण्डे राष्ट्रवाद व सांस्कृतिक गौरव के समक्ष छोटे हैं । जो इस स्वप्न में जी रहे थे कि हिंदू हमेशा जातिवाद में बँटा रहेगा , उनके सपने देर से ही सही टूटे पर टूट गए। अभी तक हिंदू समाज पूरी तरह नही जुडा है पर इतना अवश्य जुड गया है कि तुष्टिकरण की नीतियों वाले चुनाव जीत नही पाए । हिंदू समाज जब जुड जाएगा तो राजनीति के सभी विकल्पो में हिन्दुत्व होगा । तब भाजपा हो या अन्य पार्टी , कोई हिंदुत्व का तिरस्कार करके राजनीति में नहीं रह पायेगा। वह समय अभी २० वर्ष दूर है। ४-५ जीत के बाद ही सभी पार्टियों को समझ में आएगा। जब राजनीति उस स्थान पर होगी जब हिंदुत्व के बिना हिंदुस्तान की राजनीति नहीं।
2019 के चुनाव में तो राम मन्दिर व कश्मीर वाले काम नहीं हुए थे। कोई आँकड़ा ये नहीं कहता कि मोदी की लोकप्रियता कम हो रही है। सारे संकेत लोकप्रियता बढ़ने की और ही इंगित करते हैं। और हिन्दू विरोधी ताकतों के कारनामे उजागर हो रहे है। हर दिन हिन्दू और भी मोदीमय हो रहा है । लगभग दो दशक के चुनावों से मैंने भाजपा की हार व जीत दोनों का ही सही अनुमान लगाया है। जैसे दिल्ली चुनावों में तीनो बार मेरा आंकलन सही निकला। मैंने बालाकोट के समय भारत की कारवाही व 370 हटाने के समय का भी ठीक आँकलन किया था । ये बाते मैं यह स्पष्ट करने के कर रहा हूँ कि चुनाव का विश्लेषण भावना के आधार पर नहीं करता। ( चीन की समस्या में भी जब तक चीन को पता चलेगा कि वो मोदी की चतुर चाल का शिकार हो चुके है , तब तक बात हाथ से निकल चुकी होगी। ये लड़ाई सीमा की है नहीं , असली लड़ाई कुछ और ही है जो चीन हार रहा है। जितनी देर चीन सीमा पर रहेगा, भारत का लाभ होगा। ) । 2024 चुनाव थोड़ा दूर है , इसलिए अभी से कहना जल्दबाजी होगा । पर अभी तक कोई भी वस्तुनिष्ठ आँकड़ा मोदी की लोकप्रियता में कमी की ओर इंगित नहीं करता । NDA के घटक कम हो रहे है। इसका कारण यह है कि भारतीय जनता पार्टी अब घटक दलों पर निर्भरता कम कर रही है । कुछ स्थानों पर घटक दल से लाभ कम नुकसान ज्यादा है। घटक दल भी अवसरवादी राजनीति करतें हैं, कम सीटों पर अधिक पद । भाजपा का प्रभुत्व बंगाल तक जा पहुँचा है । घटक दलो के हटने से आई थोडी बहुत क्षति बंगाल, उडीसा , महाराष्ट्र की वृद्धी से पूरी हो जाएगी । और 2024 भारतीय जनता पार्टी 290-315 के आसपास सीटो से ही जीतेगी । तमिलनाडु और आंध्र अंतिम पड़ाव होंगे।
अब क्या मोदी 2024 में प्रधानमंत्री बनेंगे ? इस प्रश्न के जवाब के आपको भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह दूर की सोच रखनी होगी । भाजपा अगले तीस और वर्षों तक शासन करना चाहेगी । एक तो सदियों की गुलामी और साल वर्ष के कांग्रेस राज से हिंदुत्व को जो क्षति पहुँची , उसकी भरपाई 10-15 साल में होने से रही । जो छेक्यूलर दीमक देश को खाता रहा है वह अभी भी सक्रिय है । इन्होने योजनावद्ध तरीके से हमारा इतिहास तक बदल दिया है । फिर बहुतेरे हिंदू अभी भी सो ही रहे है जागने मे समय लगेगा । सम्पूर्ण पुनर्जागरण बहुत बड़ा काम है। इसलिए लक्ष्य अगले पचास वर्ष के शासन का होना चाहिए। इसलिए यह बहुत आवश्यक है लोगो को नया नया कुछ मिलता रहे ।भाजपा ने चुनाव लडने या मन्त्री पद के लिए उम्र की सीमा 75 रखी है । अगले चुनाव तक मोदी की उम्र 74 हो जाएगी जो सीमा से केवल 1 साल कम है । ऐसा संभव है कि 2024 चुनाव से पहले या तुरन्त बाद मोदी सन्यास की घोषणा कर दें और देश के सामने एक नया उदाहरण रख दें कि सत्ता हाथ में होते हुए भी छोडी जा सकती है । इससे वो जनता का हृदय और भी जीत लेंगे और भाजपा को और मज़बूत करके जाएंगे । देश में नई प्रथा की नीव रखेंगे कि एक व्यक्ति दो सत्र से अधिक प्रधानमंत्री ना बने । अगर मोदी सन्यास लेते हैं तो ये एक बहुत तकडा दाव होगा । जनता मोदी के त्याग के बाद और भी दीवानी हो जाएगी । मोदी के सन्यास लेने पर भाजपा को अपना ही नियम बदलना भी नहीं पडेगा । ये भी हो सकता है कि अगले सत्र में एक साल के कार्यकाल के बाद 75 वर्ष उम्र पर ही मोदी सन्यास ले ।
यद्यपि मोदी जैसा बड़ा नेता अभी भाजपा के पास नहीं , पर मोदी पचास वर्ष तक शासन नहीं कर सकते। कितना भी अच्छा हो , एक व्यक्ति इतने समय तक चुनाव जीत भी नहीं सकता। जनता ऊबने लगे इससे पहले ही नए नए नेता ढूढ़ने और तैयार करने चाहिए।
इसलिए सभंव है अमित शाह को अगला प्रधानमंत्री बनाया जाए । अमित शाह के दो कार्यकाल के बाद योगी। उसके बाद कोई नया चेहरा जो इस समय हमे नहीं दिख रहा है।
सादर प्रणाम।
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राजेश कुमार सिद्धार्थ अबतक मीडिया ग्रुप के संपादक-इन-चीफ हैं, जिन्हें 25 वर्षों से अधिक का पत्रकारिता जगत में अनुभव प्राप्त है, और जो अपनी कुशल नेतृत्व क्षमता से अबतक मीडिया ग्रुप
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