आमोद कुमार


आमोद कुमार 
बांदा बुंदेलखंड की धरती ने बरसों तक सूखे की तल्खी सही है। यहां किसान की आंखें अक्सर बादलों की ओर टिकी रहती थीं और फसल का भविष्य बारिश की मर्जी पर निर्भर रहता था। ऐसे में खेत तालाब योजना उस दूरदर्शी सोच का उदाहरण बनकर उभरी है, जिसने यह तर्क स्थापित किया कि जल संकट का स्थायी समाधान केवल आसमान से नहीं, बल्कि धरती पर जल संचयन की व्यवस्था से निकलेगा।बांदा में 4,600 से अधिक खेत तालाबों का निर्माण इस बात का साक्ष्य है कि जब योजनाएं राजनीतिक घोषणाओं से आगे बढ़कर जमीन पर उतरती हैं, तो वे केवल संरचनाएं नहीं बनातीं, बल्कि उम्मीदों के जलाशय भी तैयार करती हैं। जो किसान कभी सूखे की मार से टूट जाता था, वही आज अपने खेत के किनारे खड़े तालाब में भविष्य की हरियाली देख रहा है।
यह योजना उस पुरानी सोच को भी चुनौती देती है कि बुंदेलखंड की नियति केवल सूखा और पलायन है। खेतों में संचित पानी यह तर्क देता है कि यदि वर्षा की हर बूंद को सहेज लिया जाए, तो विपरीत परिस्थितियों में भी समृद्धि के द्वार खोले जा सकते हैं। यही कारण है कि तालाब अब केवल पानी का भंडार नहीं, बल्कि किसान के आत्मविश्वास का दर्पण बन गए हैं।गोयरा मुगली गांव के किसान रज्जाक की मुस्कान इस योजना की सबसे बड़ी गवाही है। उनके खेत का तालाब यह संदेश देता है कि पानी का संरक्षण केवल संसाधन बचाना नहीं, बल्कि किसान की मेहनत को सूखे की निर्दयता से बचाना भी है।
दरअसल, खेत तालाब योजना ने यह सिद्ध किया है कि विकास की सबसे सशक्त धारा वही होती है, जो धरती की प्यास बुझाकर किसान के चेहरे पर संतोष की चमक लौटा दे। बुंदेलखंड की तपती मिट्टी में यह योजना आज केवल जल नहीं संजो रही, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए उम्मीद, आत्मनिर्भरता और समृद्धि का भविष्य भी संवार रही है।

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