महमूदाबाद सीतापुर


कृति – “सिद्धार्थ एक मार्गदाता”
???? रचनाकार – अनुज वर्मा ‘विकल’
???? समीक्षक – रामेश्वर पवन

 

*नई दिल्ली।*
भारतीय साहित्य जगत में एक बार फिर गूंज उठा श्रृंगार रस का अद्भुत स्वर—रचनाकार अनुज वर्मा ‘विकल’ की चर्चित कृति “सिद्धार्थ एक मार्गदाता” पर प्रसिद्ध समीक्षक रामेश्वर पवन ने अपनी साहित्य समीक्षा प्रस्तुत की है।

इस समीक्षा का सबसे उल्लेखनीय हिस्सा है “यशोधरा रूप-अभिसार” पर किया गया विश्लेषण, जिसमें कवि ने यशोधरा के सौंदर्य, उसकी भावनाओं और अंतर्मन की प्रेमाभिलाषा का ऐसा सजीव चित्र खींचा है कि पाठक प्रत्यक्ष अनुभव करने को विवश हो जाता है।

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????️ *समीक्षा की प्रमुख बातें*

✅ *नायिका का रूप-वर्णन* –
“कूपज लट अस डोलती, ज्यौं नागिन इठलाय” जैसी पंक्तियाँ यशोधरा के सौंदर्य को नागिन की चपलता से जोड़कर अनुपम बना देती हैं।

✅ *भावनात्मक और मानसिक आयाम* –
“इच्छा मन अभिसार” और “कनखी अस इंगित करे” जैसी पंक्तियाँ यशोधरा के अंतर्मन में छिपी प्रेम-अभिलाषा और मानसिक मोहकता को उजागर करती हैं।

✅ *रस और अलंकार योजना* –
कृति का मूल रस श्रृंगार है, साथ ही हास्य और आश्चर्य रस की भी झलक मिलती है। उपमा, अनुप्रास, व्यतिरेक और रूपक जैसे अलंकार काव्य को और भी जीवंत बनाते हैं।

✅ *भाषा और छंद* –
ब्रजभाषा और खड़ी बोली का अद्भुत मिश्रण काव्य को परंपरा और आधुनिकता दोनों से जोड़ता है। लयात्मक छंद इसकी गेयता को और बढ़ाते हैं।

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???? *साहित्यिक महत्ता*

रामेश्वर पवन के अनुसार, यह कृति केवल यशोधरा के सौंदर्य का अंकन नहीं है, बल्कि भारतीय स्त्री की भाव-सम्पदा, सांस्कृतिक चेतना और सौंदर्य-गरिमा का काव्यमय उत्सव है।

उन्होंने इसे “रस, छंद, अलंकार और भाव—चारों आयामों में पूर्ण” कृति बताया और कहा कि अनुज वर्मा ‘विकल’ ने श्रृंगार रस की पुनर्प्रतिष्ठा आधुनिक काव्य-जगत में की है।

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✨ *निष्कर्ष*
“यशोधरा रूप-अभिसार” के माध्यम से विकल जी ने भारतीय साहित्य को एक नई ऊँचाई प्रदान की है। यह कृति न केवल परंपरा की गहराई को दर्शाती है, बल्कि आधुनिक साहित्य में भी  श्रृंगार रस की गरिमा को पुनः स्थापित करती है।

???? यह समीक्षा साहित्य जगत में चर्चा का केंद्र बनी हुई है।

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