गोरखपुर में ट्यूशन का बढ़ता बाजार


 गोरखपुर। गोरखपुर सहित पूर्वांचल के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में कोचिंग सेंटरों का जाल दिन-ब-दिन फैलता जा रहा है। विद्यालयों की पढ़ाई की गुणवत्ता में गिरावट आने से छात्र-छात्राएं अब कक्षा की जगह ट्यूशन और कोचिंग सेंटरों पर निर्भर होते जा रहे हैं। इसका सीधा असर अभिभावकों की जेब पर पड़ रहा है, जो अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए मोटी फीस चुकाने को मजबूर हैं।

कोचिंग संस्थान: शिक्षा या व्यापार?

बड़े-बड़े दावे और मार्केटिंग की चकाचौंध के बीच कोचिंग सेंटरों ने अब शिक्षा को एक व्यवसाय में बदल दिया है। नामी कोचिंग संस्थान कुछ सफल छात्रों के उदाहरण दिखाकर अपने विज्ञापन में सफलता का सब्जबाग रचते हैं। अभिभावक इस भ्रम में आ जाते हैं कि उनका बच्चा भी वहीं से पढ़कर डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस बन जाएगा।

लेकिन सच्चाई तब सामने आती है जब प्रतियोगी परीक्षाओं के परिणाम आते हैं। कई बार महंगे कोचिंग सेंटर में पढ़ने वाले छात्र असफल हो जाते हैं, जबकि साधारण संसाधनों से पढ़ने वाले छात्र सफलता प्राप्त कर लेते हैं।

फीस की मनमानी और नियंत्रणहीन व्यवस्था

कोचिंग संस्थान फीस तय करने में पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। किसी प्रकार का टैक्स या जीएसटी भी इन पर नहीं लगता, जिससे इनकी कमाई पर कोई नियंत्रण नहीं है। नाम और ब्रांड के आधार पर हजारों से लेकर लाखों रुपये तक की फीस वसूली जा रही है।

अभिभावकों के बीच भी एक सामाजिक दबाव बनता जा रहा है—"फलां व्यक्ति का बच्चा उस कोचिंग में पढ़ रहा है, तो हमें भी वहीं भेजना चाहिए।" इसी सोच में बहकर करीब 70 प्रतिशत अभिभावक बिना सोच-विचार किए अपने बच्चों को नामी कोचिंग संस्थानों में दाखिला दिला देते हैं।

क्या कहती है हकीकत?

गौर करने वाली बात यह है कि कई बार वही छात्र, जो घर पर ही मेहनत से पढ़ाई करते हैं, सीमित संसाधनों में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छे अंक हासिल कर लेते हैं। वहीं दूसरी ओर, महंगी कोचिंग में पढ़ने वाले बच्चे अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाते।

आवश्यकता है सुधार की

सरकारी निगरानी और नियमन: कोचिंग संस्थानों की फीस, गुणवत्ता और परिणामों की निगरानी हेतु नीति बनानी चाहिए।

विद्यालय शिक्षा को मज़बूत करें: यदि विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दी जाए तो कोचिंग की आवश्यकता स्वतः कम हो जाएगी।

अभिभावकों की जागरूकता: सफलता केवल महंगी कोचिंग से नहीं, बल्कि सही मार्गदर्शन और मेहनत से मिलती है।
गोरखपुर में कोचिंग सेंटरों का यह फैलता बाजार केवल शिक्षा नहीं, बल्कि एक ऐसा व्यापार बन चुका है, जो अभिभावकों की उम्मीदों और मेहनत की कमाई को भुनाने में लगा है। ज़रूरत है सटीक नीति और जागरूकता की, जिससे शिक्षा फिर से अपने मूल उद्देश्य—ज्ञान और विकास—की ओर लौट सके।

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